व्यथा कथाडूब कर संसार में हम गीत गा पाते नहीं हैं।
दर्द ऐसे हैं अधर पर जो सहज आते नहीं।।
कब किसी धुंधली कथा को रूप दे कवि ने संवारा।
और किसी घायल हृदय को प्यार से जग ने पुकारा।।
कब किसी मुरझी लता को वृक्ष ने संबल दिया है।
डूबते मझधार को कब मिल सका कोई किनारा।।
है मिटाने को हजारों पर बना पाते नहीं है।
कब किसी के भाल से मिटती बुरे दिन की निशानी।
कब किसी के कालीमा को धो सका है मेघ दानी।
कौन खुशियां बांटता है? छोड़कर अपने सहारे।
है अधूरी की अधूरी हाय मानव की कहानी।।
आंसुओं का मोल ही क्या पल हंसा पाते नहीं हैं।
सब चुराते नींद सपनों को सुला पाते नहीं।। कब चमकती बिजलियों को रोक पाया यह गगन भी।
टिमटिमाते दीप को कब साथ दे पाया पवन भी।।
हाय बुलबुल की व्यथा भी कब चमन को है दुलारी।
भाग रूठे जब किसी का छूट जाता है वतन भी।
दीप वो भी हैं जिसे हम जला पाते नहीं हैं मीत वो भी हैं जिसे हम बुला पाते नहीं।
गिरीश प्रशाद सिंह।